गुरुवार, 1 जनवरी 2009

९८.रहो जमीं पे मगर


रहो जमीं पे मगर आसमां का ख्वाब रखो तुम अपनी सोच को हर वक्त लाजवाब रखो
मिले तो ऐसे कि कोई न भूल पाये तुम्हें
महक वंफा की रखो और बेहिसाब रखो
अक्लमंदों में रहो तो अक्लमंदों की तरह
और नादानों में रहना हो रहो नादान से
वो जो कल था और अपना भी नहीं था दोस्तों
आज को लेकिन सजा लो एक नयी पहचान से!!!!

९७.क्यूं कहते हो

क्यूं कहते हो मेरे साथ कुछ भी बेहतर नही होता
सच ये है के जैसा चाहो वैसा नही होता
कोई सह लेता है कोई कह लेता है क्यूँकी ग़म कभी ज़िंदगी से बढ़ कर नही होता
आज अपनो ने ही सीखा दिया हमे
यहाँ ठोकर देने वाला हैर पत्थर नही होता
क्यूं ज़िंदगी की मुश्क़िलो से हारे बैठे हो
इसके बिना कोई मंज़िल, कोई सफ़र नही होता
कोई तेरे साथ नही है तो भी ग़म ना कर
ख़ुद से बढ़ कर कोई दुनिया में हमसफ़र नही होता..

९६.अपनी इच्छा को

अपनी इच्छा को पाने एक लिए उसके बारे मैं सोचना अच्छी बात है मगर लाइफ़ मे सब कुछ नही मिलता इस बात के लिए हमेशा तैयार रहे। लाइफ़ के हर पल को सरलता से लीजिए एंजोय कीजिए ज़ीनदगी मे बुरा समय कब आ जाए पता नही. ऐसी कोई भी मुश्किल नही हे जिसका समाधान ना हो बस आपकी एक मीठी सी मुस्कान दूसरो को और ख़ुद आपको सुकून देगी दुख सबकी ज़िंदगी आते रहते है अब उन्हे सुख से हस कर अनदेखा कर दिए जाए तो लाइफ़ सुँदर बनाई जा सकती हे इसलिए हंसना ही ज़िंदगी है"

९५. न लाना कभी किसी


न लाना कभी किसी को करीब अपने ,
होकर करीब अक्सर वो दूर चले जाते है ,
सिर्फ़ पल भर का प्यार दे कर वो ,
जिंदगी भर का दर्द बन जाते है.....

९४. वो हमे भूल जाने


वो हमे भूल जाने की बात करते है ,
ज़रा उनसे पूछो की वो हमे कब याद करते है ,
जो करते थे कभी हमसे प्यार भरी बातें ,
न जाने क्यों आज वो अकेले रहने की बात करते है.....

९३. सपनो की तरह

सपनो की तरह आकर चले गए ,
अपनों को भुला कर चले गए ,
किस भूल के सज़ा दी आपने हमें ,
पहले हँसाया फिर रुला कर चले गए ......